मन की दुनिया वही बनती है, जो आप रोज़ दोहराते हैं
हम सबके जीवन में कुछ दिन ऐसे आते हैं जब लगता है जैसे सब कुछ उल्टा चल रहा है। कुछ काम अधूरे रह जाते हैं, कुछ लोग उम्मीद से अलग निकलते हैं, कुछ बातें दिल पर लग जाती हैं, और कई बार हम खुद से भी नाराज़ हो जाते हैं कि हम इतने थक क्यों गए, इतने टूट क्यों गए, या इतने चिड़चिड़े क्यों हो गए। जीवन का यही सच है कि वह हर रोज एक जैसी गति से नहीं चलता, और हर दिन एक जैसा नहीं दिखता।
लेकिन एक और सच है, जो लोग देर से समझते हैं, और जो समझ जाते हैं वे अंदर से बहुत स्थिर हो जाते हैं। वह सच यह है कि हमारे जीवन की दिशा उतनी नहीं बदलती जितनी हमारे शब्द बदल देते हैं, क्योंकि हम जिन चीजों की सबसे ज्यादा बात करते हैं, वही चीजें धीरे-धीरे हमारे भीतर सबसे ज्यादा जगह बना लेती हैं।
इसलिए यह बात इतनी गहरी है कि इसे सिर्फ पढ़कर छोड़ देना ठीक नहीं होगा।
आशीर्वादों की बात करने की आदत बनाइए, बोझों की नहीं।
यह कोई मीठी-मीठी बात नहीं है, और न ही यह किसी दुख से भागने का तरीका है। यह जीवन को संभालने की एक समझदार कला है, जो इंसान को भीतर से मजबूत बनाती है, और बाहरी दुनिया की अव्यवस्था के बीच भी उसे संतुलित रखना सिखाती है।
बोझ हमेशा तेज आवाज में आते हैं, आशीर्वाद अक्सर धीरे से होते हैं
जीवन में परेशानियाँ अपने आप ध्यान खींच लेती हैं, क्योंकि उनका स्वभाव ही ऐसा होता है। वह आकर हमारे मन के दरवाज़े पर जोर से दस्तक देती हैं, भीतर घुसती हैं, और फिर हमारी सोच पर कब्ज़ा करने लगती हैं। एक छोटी सी बात भी अगर मन में बैठ जाए तो पूरे दिन की शांति बिगाड़ सकती है।
लेकिन आशीर्वाद ऐसा नहीं करते।
आशीर्वाद अक्सर हमारे सामने रोज़ होते हैं, और हम उन्हें देखकर भी नहीं देखते, क्योंकि हमारी आँखें परेशानियों पर ज़्यादा देर टिकती हैं।
जैसे आपकी सांसें चल रही हैं, आपकी आंखें देख पा रही हैं, आपके पास घर है, आपके पास कुछ लोग हैं, आप किसी तरह अपना जीवन संभाल पा रहे हैं, आपके पास सुबह उठने की ताकत है, आपके पास खाने-पीने की व्यवस्था है, आपके पास सोचने की क्षमता है कि “मैं बेहतर कर सकता हूँ”, ये सब बहुत बड़े आशीर्वाद हैं, लेकिन हम उन्हें सामान्य समझकर छोड़ देते हैं।
परेशानी असामान्य लगती है, इसलिए वह अधिक प्रभाव डालती है।
आशीर्वाद सामान्य लगते हैं, इसलिए हम उन्हें हल्का मान लेते हैं।
यहीं पर सबसे बड़ी गलती होती है।
आप जिस भाषा में बोलते हैं, मन उसी दिशा में चलने लगता है
यह बात बहुत लोगों को अजीब लगती है, लेकिन यह पूरी तरह सच है कि इंसान अपने शब्दों से अपने भीतर का माहौल बनाता है। अगर कोई व्यक्ति हर दिन सिर्फ अपनी परेशानियों की बात करता है, अपने दुखों का जिक्र करता है, लोगों की गलतियों को गिनता है, अपने नुकसान को याद करता है, और अपने जीवन की कमियों पर ही चर्चा करता है, तो धीरे-धीरे उसका मन उसी तरह का बन जाता है।
वह चाहकर भी हल्कापन महसूस नहीं कर पाता, क्योंकि उसने अपने भीतर लगातार बोझ जमा कर रखा होता है।
और दूसरी तरफ, जो व्यक्ति मुश्किलों को मानता भी है, लेकिन साथ ही अपने जीवन में जो अच्छा है उसकी भी पहचान करता है, अपने भीतर धन्यवाद का भाव रखता है, छोटी-छोटी चीजों में भी अच्छाई देखता है, और अपने शब्दों से उम्मीद बनाए रखता है, उसका मन बहुत अलग तरीके से काम करने लगता है।
बोझ सबके पास होते हैं।
पर बोझ का वजन सबके लिए बराबर नहीं होता।
कई बार वजन बढ़ता नहीं, हम उसे बार-बार उठाते रहते हैं।
और हम उसे बार-बार इसलिए उठाते हैं क्योंकि हम उसकी बात बार-बार करते हैं।
सकारात्मकता कोई जादू नहीं है, पर यह गति जरूर पैदा करती है
कई लोग जब “सकारात्मक सोच” की बात सुनते हैं तो उन्हें लगता है कि यह बस हवा-हवाई बातें हैं, या फिर ऐसा दिखावा है जैसे सब ठीक है, जबकि वास्तव में सब ठीक नहीं है। लेकिन सच्चाई यह है कि सकारात्मकता का मतलब यह नहीं होता कि आप दुख को नकार रहे हैं, बल्कि इसका मतलब यह होता है कि आप दुख को अपनी पूरी पहचान नहीं बना रहे हैं।
सकारात्मकता एक दिशा है।
एक मानसिक अनुशासन है।
एक ऐसा निर्णय है जो आप रोज़ लेते हैं कि “मैं टूटकर नहीं बैठूंगा, मैं संभलकर आगे बढ़ूंगा।”
जो व्यक्ति हर परिस्थिति में सिर्फ शिकायत करता है, वह धीरे-धीरे अपने भीतर से खाली होने लगता है।
और जो व्यक्ति हर परिस्थिति में कुछ ना कुछ अच्छा ढूंढ लेता है, वह अपनी ऊर्जा बचा लेता है, और वही ऊर्जा उसके लिए नया रास्ता बनती है।
आप मानिए या ना मानिए, लेकिन जो लोग अपने जीवन में आशीर्वादों की बात अधिक करते हैं, उनके चेहरे पर अलग प्रकार का संतुलन दिखता है। उनके शब्दों में कम शोर होता है, और उनके भीतर अधिक स्थिरता होती है।
वह खिड़की बंद करिए जो आपकी शांति बिगाड़ती है, चाहे वह कितनी भी आकर्षक लगे
यह लाइन जितनी आसान लगती है, उतनी ही मुश्किल भी है। क्योंकि जीवन में सबसे ज्यादा नुकसान उन्हीं चीज़ों से होता है जो शुरुआत में बहुत आकर्षक लगती हैं।
कुछ लोग शुरुआत में बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन धीरे-धीरे आपकी ऊर्जा खा जाते हैं।
कुछ आदतें शुरुआत में आराम देती हैं, लेकिन बाद में आपके भीतर बेचैनी बढ़ा देती हैं।
कुछ बातचीत शुरुआत में मज़ाक लगती है, लेकिन बाद में दिमाग भारी कर देती है।
कई बार हम जानते हैं कि कोई चीज हमें परेशान कर रही है, फिर भी हम उसे छोड़ नहीं पाते, क्योंकि वह चीज हमारे अंदर एक तरह की लत बन चुकी होती है।
आपको अपने जीवन की शांति बचाने के लिए कुछ खिड़कियां बंद करनी ही पड़ती हैं, जैसे:
आपकी तुलना बढ़ाने वाली सोशल मीडिया आदतें
हर समय नकारात्मक बातें फैलाने वाले लोग
हर बार ताना मारकर खुद को बड़ा साबित करने वाली बातचीत
पुराने रिश्तों के दर्द को बार-बार खुरचना
ऐसी चीजें जो आपकी नींद, ध्यान और आत्मसम्मान छीनती हैं
और सबसे बड़ी बात, कभी-कभी आपको अपने मन की खिड़की भी बंद करनी पड़ती है, क्योंकि आपके भीतर का मन खुद ही आपको परेशान करने लगता है, पुरानी बातें उठाता है, पुरानी शर्म, पुरानी असफलताएँ, पुराना पछतावा, और फिर वह सब दोहराता है जैसे कोई फिल्म चल रही हो।
शांति का मतलब यह नहीं कि जीवन में समस्या नहीं होगी।
शांति का मतलब यह होता है कि समस्या होने के बाद भी आपका मन अपनी जगह पर रहेगा।
मन में क्या आने दे रहे हैं, यह आपका रोज़ का फैसला है
हम अक्सर सोचते हैं कि हमारा मन हमारे नियंत्रण में नहीं है। हम कहते हैं कि “सोचें आती हैं, क्या कर सकते हैं।”
लेकिन सच यह है कि विचार आते जरूर हैं, पर उन्हें रोककर बैठने की जगह देना, उन्हें दोहराना, उन्हें अपना बनाना, यह हमारे हाथ में होता है।
आप अपने मन में क्या डाल रहे हैं, वह आपके जीवन के हर हिस्से को बदल देता है।
आप जो कंटेंट देखते हैं, वही आपके सोचने का तरीका बनता है।
आप जिन लोगों के साथ बैठते हैं, वही आपकी ऊर्जा का स्तर तय करते हैं।
आप जिन बातों में रुचि रखते हैं, वही आपकी मानसिक दिशा बनाते हैं।
इसलिए अनुशासन सिर्फ सुबह उठने या मेहनत करने का नाम नहीं है।
अनुशासन यह भी है कि आप अपने मन में क्या प्रवेश करने दे रहे हैं।
हर चीज देखने लायक नहीं होती।
हर बात सुनने लायक नहीं होती।
हर चर्चा में शामिल होना जरूरी नहीं होता।
हर बहस जीतनी जरूरी नहीं होती।
कभी-कभी सबसे बड़ी जीत यह होती है कि आप अपनी शांति बचा लेते हैं।
आपका ध्यान जहां जाता है, आपकी ऊर्जा वही बहने लगती है
यह बात सबसे बड़ी है, क्योंकि जीवन के सारे बदलाव इसी से शुरू होते हैं।
अगर आपका ध्यान हर समय कमी पर रहेगा, तो आपको हर समय कमी ही दिखेगी।
अगर आपका ध्यान हर समय डर पर रहेगा, तो आपको हर कदम डरावना लगेगा।
अगर आपका ध्यान हर समय शिकायत पर रहेगा, तो आपका मन आनंद महसूस करना भूल जाएगा।
और अगर आपका ध्यान छोटी-छोटी अच्छाइयों पर भी रहेगा, तो आपका जीवन धीरे-धीरे फिर से हल्का होने लगेगा।
यह बहुत सरल लगती हुई बात है, लेकिन इसे अपनाना बहुत बड़ा परिवर्तन होता है।
क्योंकि ध्यान सिर्फ देखने की चीज नहीं है।
ध्यान आपकी भावनाओं को आकार देता है।
ध्यान आपके फैसलों को दिशा देता है।
ध्यान आपकी आदतों को बनाता है।
और आदतें ही आपका भविष्य लिखती हैं।
बोझों को मानिए, लेकिन उन्हें अपना घर मत बनाइए
जीवन में दुख होना गलत नहीं है।
टूट जाना इंसानी बात है।
थक जाना भी स्वाभाविक है।
लेकिन दुख को अपनी पहचान बना लेना बहुत खतरनाक होता है।
कई लोग दुख में रहते हुए भी बाहर निकल सकते हैं, पर वे बाहर नहीं निकलते क्योंकि उनका मन दुख की दुनिया को ही अपना घर मान चुका होता है।
वे हर बातचीत में उसी दुख का जिक्र करते हैं।
वे हर इंसान में वही चोट ढूंढते हैं।
वे हर मौके में वही डर देखते हैं।
और धीरे-धीरे उनका जीवन सिर्फ बचने की कोशिश बन जाता है, जीने की नहीं।
आपका जीवन बोझों के लिए नहीं बना है।
आपका जीवन आगे बढ़ने के लिए बना है।
इसलिए बोझों की बात कम करिए, उन्हें हल करने का तरीका खोजिए।
और आशीर्वादों की बात ज्यादा करिए, क्योंकि वही आपकी ऊर्जा वापस लाते हैं।
आशीर्वाद बोलने की आदत कैसे बने, बिना बनावटी लगे
बहुत लोगों को लगता है कि अगर हम आशीर्वादों की बात करेंगे तो लोग कहेंगे कि यह दिखावा कर रहा है, या यह नकली बन रहा है। लेकिन आशीर्वादों की बात करना दिखावा नहीं होता, अगर आप इसे सच्चाई के साथ करें।
आप दिन में बस इतना कहना शुरू करें:
आज भी मैं चल पा रहा हूँ, यह मेरे लिए बड़ा है।
आज भी मेरे पास कुछ लोग हैं, यह मेरे लिए महत्वपूर्ण है।
आज भी मेरे पास सुधार करने का मौका है, यह मेरे लिए आशीर्वाद है।
आज भी मैं हार के बाद खड़ा हो पा रहा हूँ, यह मेरी ताकत है।
धीरे-धीरे आपका मन सीख जाएगा कि जीवन में अच्छा देखना भी एक कला है, और यह कला अभ्यास से आती है।
और सबसे खूबसूरत बात यह है कि जब आप आशीर्वादों की बात करते हैं, तो आपकी आंखों की चमक वापस आने लगती है, आपका व्यवहार हल्का होने लगता है, आपके संबंध सुधरने लगते हैं, और आपका मन फिर से स्थिर हो जाता है।
अंत में सिर्फ एक बात याद रखिए
आपके पास जो बोझ हैं, वे वास्तविक हो सकते हैं, और मैं यह नहीं कह रहा कि उन्हें नजरअंदाज कर दीजिए।
लेकिन आपका जीवन सिर्फ बोझों की सूची नहीं है।
आपके पास जो भी आशीर्वाद हैं, वह भी उतने ही वास्तविक हैं, और कई बार वे इतने पास होते हैं कि हम उन्हें देख ही नहीं पाते।
आज अगर मन भारी है, तो खुद से एक सवाल पूछिए:
क्या मैं अपनी जिंदगी के बारे में सिर्फ वही बोल रहा हूँ जो बिगड़ा है, या मैं वह भी बोल रहा हूँ जो बचा हुआ है, जो अच्छा है, जो मेरे साथ है?
क्योंकि जीवन में बहुत कुछ बदलने से पहले, भाषा बदलती है।
और भाषा बदलने से पहले, नजरिया बदलता है।
इसलिए आज से एक छोटा सा नियम बना लीजिए:
बोझ हैं, तो मानो।
पर आशीर्वाद भी हैं, तो बोलो।
क्योंकि आपका ध्यान जहां जाएगा, आपकी ऊर्जा वही बह जाएगी।
और आपकी ऊर्जा जिस दिशा में बहेगी, आपका जीवन वहीं बनने लगेगा।